कैसे एक Newspaper Cutting से बनी सुपरहिट ‘Mera Gaon Mera Desh’? 20 Unknown Facts

Raj Khosla और ‘Mera Gaon Mera Desh’ की Real Story Inspiration

1960 के दशक की बात है। मशहूर फिल्म निर्माता राज खोसला एक दिन अपने घर पर बैठे चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहे थे। उन दिनों अखबार डाकुओं की खबरों से भरे होते थे। कहीं कोई लूटमार की खबर तो कहीं पुलिस मुठभेड़ की न्यूज़। तभी राज खोसला की नजर एक ऐसी खबर पर पड़ी जिसने आगे चलकर एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म की नींव रखी।

खबर यह थी कि एक गांव के लोगों ने फैसला कर लिया था कि हम सब मिलकर डाकुओं का मुकाबला करेंगे और उन्होंने ऐसा ही किया। गांव वालों ने 13 डाकुओं को मार दिया था। यह खबर राज खोसला के मन में बैठी रही। फिर एक समय पर राज खोसला के मन में विचार आया कि इस तरह की कोई फिल्म बनाई जाए।

उस दौर में कई प्रोडक्शन हाउसेस के अपने स्टोरी डिपार्टमेंट होते थे। डाकुओं की यह कहानी तैयार करने के लिए Raj Khosla Interprice का स्टोरी डिपार्टमेंट काम पर लग गया। इस टीम में राज खोसला के साथ थे उनके बहुत खास लेखक अख्तर रोमानी और जी.आर. कामथ। 

Vinod Khanna कैसे बने Iconic Villain Jabbar Singh?

राज खोसला चाहते थे कि मेरी इस फिल्म में जो विलेन होगा जो मेन डाकू होगा वो बहुत बुरा आदमी लगना चाहिए। उसके डाकू बनने की कोई जस्टिफिकेशन ना हो। वो इतना बुरा हो जो औरतों की इज्जत ना करता हो। बच्चों को जान से मारना उसे नॉर्मल बात लगती हो। साथ ही वह डाकू दिखने में बहुत अट्रैक्टिव हो। उसकी पर्सनालिटी से लगे कि यह कुछ भी कर सकता है।

राज जी ने बताया था कि जब मैं विनोद खन्ना से मिला, मैंने यह सारी बातें विनोद खन्ना को बताई। विनोद खन्ना तब बहुत माइनर रोल कर रहे थे। मेरी फिल्म का निर्दई डाकू बनने के लिए आसानी से तैयार हो गए. क्योंकि पहली बार विनोद खन्ना को कोई ऐसा मौका मिल रहा था, जहां वो किरदार के अंदर समा सकते थे, और याद रखने लायक कोई काम कर सकते थे। राज जी ने बताया था कि विनोद खन्ना के चलने का अंदाज, उसके शार्प पिक्चर्स, अच्छा कद सब कुछ ‘जबर सिंह’ का किरदार निभाने के लिए परफेक्ट था।

Dharmendra की Body Transformation और Action Preparations

धर्मेंद्र फिल्म के लीडिंग कैरेक्टर अजीत बने थे। राज खोसला के कहने पर धर्मेंद्र ने अपने शरीर पर बहुत काम किया था। राज जी ने बताया था कि इससे पहले भी धर्मेंद्र ने कुछ फिल्मों में थोड़ा बहुत एक्शन किया था और उन फिल्मों में फीमेल करेक्टर्स की बहुत इंपोर्टेन्स रही, और धर्मेंद्र का फिजिकल अपीरियंस शुरू से ही एक ही तरह का रहा। मजबूत गठीला बदन था। इस फिल्म में धर्मेंद्र पूरी तरह हीरो थे। काफी एक्शन था। हीरोइन ओरिएंटेड कहानी नहीं थी। मुझे यहां धर्मेंद्र का अपीरियंस ज्यादा एक्टिव और शार्प चाहिए था। इसलिए मैंने धर्मेंद्र को समझाया कि मैं क्या चाहता हूं। 

Udaipur Chirwa में Film की Shooting Memories

फिल्म का सारा यूनिट राजस्थान में उदयपुर के करीब एक गांव चीरवा में ठहरा था। हर सुबह गांव के लोग धर्मेंद्र को घोड़े की सवारी करते देखते, बैडमिंटन खेलते देखते और मिट्टी की गलियों में साइकिल चलाते देखते थे। धर्मेंद्र ने राज खोसला को बताया था कि हर रोज देर शाम मुझे ड्रिंक करने की आदत है। राज खोसला ने कहा कि क्या रखा है दारू वारू में। राज खोसला ने एक तरह से धर्मेंद्र को कसम खिला दी थी कि तुम शराब नहीं पियोगे। फिल्म में मैं तुम्हें बहुत ज्यादा खूबसूरत, बहुत चुस्त, बहुत फिट नौजवान दिखाना चाहता हूं। धर्मेंद्र उनकी बात मान गए और अपने अपीरियंस को बेहतर करने में लगे रहे। हर रात राज खोसला खुद ड्रिंक करते ही थे। इसलिए उन्हें देखते हुए अपने आप पर कंट्रोल रखना धरम जी के लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज था।

धरम जी ने बताया था कि एक बार दोपहर में हम लोग खेतों में बैठे थे। तब लेखराज जी हमसे मिलने आए। हम लोग उन्हें पापा जी कहते थे। लेखराज खोसला राज खोसला के भाई थे। लेखराज जी वहां कुछ वाइन की बोतलें छोड़कर चले गए। राज जी ने धरम जी से कहा, “देख जरा, कैसी है यह वाइन? धरम जी ने कहा, “वाइन मेरे टाइप की चीज नहीं है। वैसे भी मैंने ड्रिंकिंग छोड़ी हुई है।” फिर भी राज खोसला बहुत प्यार से कहते रहे, “थोड़ी सी पी के तो देखो।”

धर्मेन्द्र ने सोचा राज जी को थोड़ी कंपनी दे देता हूं। धर्मेन्द्र ने भी पीनी शुरू कर दी। राज खोसला ने अपना हारमोनियम वहां मंगा लिया और अपने फेवरेट के.एल. सहगल के गाने गाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वो शाम नशे और म्यूजिक से भरी एक शाम बन गई। राज जी ने बताया था कि अगले दिन धर्मेंद्र को बहुत हॉर्स राइडिंग करनी थी। राज खोसला ने धर्मेन्द्र से कहा, “बस करो धरम, ज्यादा मत पियो। मैं चाहता हूं कल तुम बिल्कुल फ्रेश नजर आओ।”

Dharmendra का Dangerous Horse Stunt और Raj Khosla की चिंता

अगले दिन धर्मेंद्र ने घोड़े पर जो सीन करना था, वह थोड़ा रिस्की था। राज खोसला ने धर्मेन्द्र से कहा, “ये सीन तुम खुद मत करना, स्टंट मैन कर लेगा।”

एक्शन डायरेक्टर थे रवि खन्ना। उन्होंने भी धर्म जी को मना किया कि यह स्टंट खुद ना करें। पर धरम जी नहीं माने। उन्होंने कहा, “मैं यह सीन खुद ही करूंगा।” धरम जी ने वह शॉट दिया और ठीक कैमरे के पास आकर घोड़े से गिर गए। राज खोसला ने धरम जी को गिरते देखा और रोने लगे।

धरमजी कितने स्ट्रांग थे, यह तो आप सब जानते हैं। धर्म जी गिरे और उठकर खड़े हो गए। उन्हें कोई गहरी चोट नहीं आई थी। राज जी ने रोते-रोते धर्म जी को डांटना शुरू कर दिया, “क्यों किया तुमने ऐसा धरम? अगर चोट लग जाती तो?

राज खोसला का यह पहलू भी बहुत बार सामने आता था। वह बहुत इमोशनल थे। अपनी फिल्म और अपने कलाकारों के लिए राज खोसला बहुत जज्बाती हो जाते थे। किसी से आंसू छुपाने की कोशिश भी नहीं करते थे। बाद में बहुत इंटरव्यूज में राज खोसला अपने गुरु गुरुदत्त को याद करके और अपनी मां को याद करके रोने लगते थे। धरमजी ने एक बार बताया था, कि राज जी अपना दर्द छुपाने की कोशिश करते थे। पर दर्द कहां छुपता है? पहले तो वह शराब पीकर अपना दुख भुलाने की कोशिश करते थे। बाद में उन्हें शराब पीने की आदत ही हो गई थी। 

Asha Parekh का Role और Raj Khosla की Directing Style

फीमेल लीड अंजू के किरदार के लिए राज खोसला ने आशा पारेख को चुना। आशा पारेख की राज खोसला के साथ यह तीसरी फिल्म थी। पहली बार आशा जी ने राज जी के साथ 1966 में आई फिल्म ‘दो बदन’ में काम किया था। ‘दो बदन’ में आशा जी का काम दुनिया को तो पसंद आया ही, खुद आशा जी को बहुत पसंद था। इसके बाद राज खोसला के निर्देशन में आशा पारेख ने 1969 में आई फिल्म ‘चिराग’ में काम किया था। आशा जी का काम इसमें भी बहुत अच्छा था, और उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड्स में नॉमिनेशन मिला था। इन दोनों फिल्मों में राज जी ने आशा जी से रूटीन हीरोइन वाला काम नहीं करवाया था। जिस तरह के रोल्स नॉर्मली आशा जी करती थी। इस बार Mera Gaon Mera Desh आशा जी का रोल बहुत इंपॉर्टेंट नहीं था। फिर भी बहुत सीन ऐसे थे जहां उनकी प्रेजेंस ने फिल्म का ग्रेस बढ़ाया और धर्म जी के साथ उनकी सुपरहिट जोड़ी का असर फिल्म की कामयाबी पर भी पड़ा।

Poornima Das Verma: Imran Hashmi की Dadi का Special Role

फिल्म में पागल मौसी का किरदार निभाया था पूर्णिमा ने। पूर्णिमा का असली नाम था मेहरबानो। 1940 के दशक के आखिरी हिस्से में मेहरबानो ने फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। विकपीडिया के हिसाब से निर्देशक रमनवीर देसाई के कहने पर मेहरबानो ने अपना स्क्रीन नेम पूर्णिमा कर लिया था। मेहरबानो की बड़ी बहन शीरीन बानो भी एक्ट्रेस थी। शीरीन बानो निर्देशक महेश भट्ट की मां थी। यानी पूर्णिमा महेश भट्ट की मौसी थी। मेहरबानो यानी पूर्णिमा की पहली शादी सैयद शौकत हाशमी से हुई थी जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में सेटल हो गए थे। इस शादी से हुए बेटे का नाम था अनवर हाशमी। अनवर हाशमी ने 1968 की फिल्म ‘बहारों की मंजिल’ में भी काम किया था। अनवर हाशमी के बेटे का नाम है इमरान हाशमी। यानी पूर्णिमा इमरान हाशमी की दादी थी। पहले पति के पाकिस्तान में सेटल हो जाने के बाद 1954 में पूर्णिमा ने फिल्म मेकर भगवान दास वर्मा के साथ शादी कर ली थी। इसलिए उनका नाम अक्सर पूर्णिमा दास वर्मा लिखा जाता है। 2013 में पूर्णिमा गुजर गई थी। राज खोसला के साथ पूर्णिमा की पहली मुलाकात तब हुई जब राज खोसला गुरुदत्त के असिस्टेंट थे। तब फिल्म बन रही थी जाल। इसमें पूर्णिमा ने लीजा का किरदार निभाया था। जाल 1952 में आई थी। मेरा गांव मेरा देश में पूर्णिमा ने अपना किरदार बहुत अच्छा निभाया था। 

Jayant की Powerful Screen Presence और Performance

फिल्म के इंपॉर्टेंट कैरेक्टर मेजर जसवंत सिंह के रोल के लिए राज खोसला ने जयंत को चुना। जयंत साहब की पर्सनैलिटी और अंदाज ही इतना शानदार था कि जब वह स्क्रीन पर होते थे तो स्क्रीन का ग्रेस बढ़ा देते थे। आपको बता दें कि जयंत अमजद खान और इम्तियाज़ खान के पिता थे। मेरा गांव मेरा देश से पहले राज खोसला जयंत से अपनी फिल्म दो रास्ते में भी एक इंपॉर्टेंट किरदार करवा चुके थे। राज जी के अनुसार दोनों ही फिल्मों में जयंत का रोल ऐसा था कि जरा सी चूक हो जाती तो वो ओवरएक्टिंग का शिकार हो सकते थे। पर जयंत इतने कमाल के कलाकार थे जो बहुत सहज होकर अपनी बात को असरदार बना देते थे।

Laxmi Chhaya का रोल कैसे बना फिल्म का Turning Point?

10 साल की उम्र में ही लक्ष्मी छाया पहली बार पर्दे पर नजर आई थी। महेश कोल की 1958 में आई फिल्म तलाक में। इस फिल्म के क्लासरूम के सीक्वेंस में मुमताज और अरुणा ईरानी भी एज ए चाइल्ड आर्टिस्ट नजर आती हैं। जब लक्ष्मी जी थोड़ी बड़ी हुई तो उन्हें छोटे-छोटे रोल मिलते रहे। ज्यादातर हीरोइन की सहेली का रोल मिलता था। इसके साथ-साथ लक्ष्मी छाया बहुत अच्छी डांसर भी थी। इसलिए उन्हें कई गानों में भी काम मिलता रहा। पर अक्सर लोगों को उनका कोई काम याद नहीं आता। लक्ष्मी छाया का नाम सामने आते ही सबसे पहले लोगों को मेरा गांव मेरा देश ही याद आती है। यही उनके करियर का सबसे बेहतर रोल रहा।

खुद लक्ष्मी जी ने भी एक बार अमीन सयानी से बात करते हुए बताया था कि मेरे करियर का सबसे इंपॉर्टेंट सबसे लंबा रोल Mera Gaon Mera Desh में ही था। यह सब राज खोसला जी की मेहरबानी थी। राज जी मुश्किल सीन भी ऐसे एक्सप्लेन करते थे जैसे बहुत मामूली सी बात हो। सीन शूट करते समय हमें ठीक से समझ में नहीं आता था कि इसका असर कुछ होगा भी या नहीं। पर फिल्म देखते समय पता चलता है कि सीन कितना बढ़िया बना है। लक्ष्मी छाया ने बताया था कि राज जी मजाक भी बहुत करते थे। मेरा गांव मेरा देश की शूटिंग शुरू होने के कुछ दिन बाद मुझे यूनिट को ज्वाइन करना था। मैं उदयपुर पहुंची तो उस दिन बादल छाए हुए थे। राज जी ने मुझे देखते ही कहा “लक्ष्मी अपने साथ छाया ले आई।” 

कुछ लोगों ने यह भी लिखा था कि असल में इस फिल्म में लक्ष्मी छाया का रोल छोटा ही था। उन्हें डाकू जब्बर सिंह की खबरी बनकर गांव में जाना था। पर धीरे-धीरे लक्ष्मी जी का काम देखकर उनके रोल को बेहतर अंदाज में डेवलप किया गया और लक्ष्मी छाया जी ने बहुत खूबसूरती से यह किरदार निभाया।

Mera Gaon Mera Desh के सुपरहिट Songs का Birth Story

फिल्म Mera Gaon Mera Desh में कुल 5 गाने थे। राज खोसला ने अपनी फिल्म के गानों को एक खास अंदाज दिया। सारे गाने एक कन्वर्सेशन की तरह रखे, बातचीत की तरह रखे। मजे की बात यह थी कि आशा पारेख जैसी बड़ी स्टार होते हुए भी फिल्म के पांच गानों में से तीन गाने लक्ष्मी छाया पर फिल्माए गए क्योंकि गाने ऐसे थे जो कहानी को आगे बढ़ा रहे थे। 

पहला गाना “आया आया अटरिया पे कोई चोर”, मुन्नी बनी लक्ष्मी छाया को उस गांव में इस्टैब्लिश करने के लिए था। दूसरा गाना “अपनी प्रेम कहानियाँ” मेले में बहुत इंपॉर्टेंट सिचुएशन पर था। जैसी जबरदस्त सिचुएशन थी वैसे ही जबरदस्त गाने के बोल लिखे गए। तीसरा और आखिरी गाना तो सबसे खास था।

‘Maar Diya Jaye’ गाने की Creation और Backstory

 मेरा गांव मेरा देश का नाम सामने आते ही सबसे पहले यही गाना याद आता है। सिचुएशन यह थी कि अजीत और अंजू यानी हीरो हीरोइन को बांधा हुआ है। गाना गाती है मुन्नी। कहानी में मुन्नी कभी सही का कभी गलत का साथ देने में उलझी रही। मुन्नी का झुकाव भी अजीत की तरफ हो चुका था। यह सारी बातें दिमाग में रख के गाना बनाना था। अब यह गाना फिल्म का आखिरी गाना है। बहुत इंपॉर्टेंट सिचुएशन है। गाना क्या होना चाहिए यह तय नहीं हो पा रहा था। इसलिए राज खोसला इस गाने की शूटिंग को टालते रहे।

राज जी ने बताया था कि मैंने लक्ष्मीकांत और आनंद बक्शी को गाने की सिचुएशन समझाई। पूरी बात सुनकर आनंद बख्शी ने सिकंदर और पोरस के बीच हुई फेमस बातचीत का रेफरेंस दिया और कहा गाना ऐसा होगा “मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए।”

राज जी ने बताया था कि कुछ ही पल में पूरा गाना लिखा गया। कई लोगों ने राज जी से कहा कि आपने अपने स्ट्रांग हीरो धर्मेंद्र को तो बांध रखा है। एक शानदार डांसर आशा पारे को भी बांध रखा है। खतरनाक डाकू विनोद खन्ना को बैठकर दारू पीने के लिए कहा है। सारा गाना मुन्नी बनी लक्ष्मी छाया के भरोसे है। गाना असरदार कैसे बनेगा। पर फाइनली गाना कितना असरदार बना यह सारी दुनिया जानती है। यही कमाल था राज खोसला, आनंद बक्शी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का।

Mera Gaon Mera Desh के दो गाने फिल्म की हीरोइन आशा पारे के हिस्से भी आए। आशा जी ने बताया था कि राज कौशला जब मूड में होते थे तो शॉट्स में एक्सपेरिमेंट करते रहते थे। सोना ले जा रहे यह पूरा गाना राज जी ने राउंड ट्रॉली लगाकर शूट किया था। बीच में कुछ अलग शॉट्स थे, क्लोजअप थे। राज खोसला उन चुनिंदा डायरेक्टर्स में से थे जो गाना फिल्माने में माहिर थे। 

Lata Mangeshkar & Rafi: फिल्म की Melody का असली जादू

फिल्म के पांचों गाने लता जी ने गाए थे। सिर्फ एक गाना ऐसा था, जिसमें मेल वॉइस साथ थी. और वह आवाज थी रफी साहब की। गाना था, “कुछ कहता है ये सावन..क्या कहता है?” धर्मेंद्र हर गाने में मौजूद थे पर पर्दे पर उन्होंने एक ही गाना गाया। बाकी गानों की तरह यह गाना आज भी उतना ही पॉपुलर है। 

Mahesh Bhatt के Experience: Raj Khosla का Working Style

महेश भट्ट इस फिल्म में प्रोडक्शन कंट्रोलर भी थे और राज खोसला के असिस्टेंट डायरेक्टर भी थे। महेश भट्ट ने बताया था कि राज जी को शूट पर लाने के लिए सुबह जगाना बहुत मुश्किल काम होता था। राज खोसला के बारे में यह फेमस था कि उन्हें सुबह जल्दी उठना सबसे मुश्किल काम लगता था। कई बार वो खुद ही अपना शूट कैंसिल कर देते थे। महेश जी ने बताया था कि राज जी जब तक शॉट से खुद सेटिस्फाई नहीं होते थे, शॉट ओके नहीं करते थे। कई बार शूट किया हुआ पोरशन भी दोबारा शूट करते थे। 

Climax Shooting: पूरे गांव ने कैसे दिया साथ?

Mera Gaon Mera Desh के क्लाइमेक्स के लिए राज खोसला ने चीरवा गांव के लोगों को इकट्ठा कर लिया था। सबसे कहा जिसके घर में जो भी हथियार है लेकर आ जाए। सारा गांव अपने-अपने घर से हथियार लेकर आ गया। कुछ लोगों के पास बहुत पुरानी तलवारें भी थी। राज खोसला ने सारे गांव वालों को समझाया कि धर्मेंद्र और विनोद खन्ना एक्टर हैं। यह दोनों एक दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। कहानी के हिसाब से विनोद खन्ना डाकू हैं। गांव वालों ने राज जी की बात समझकर पूरा कोऑपरेट किया। सारे फिल्म यूनिट को लस्सी पिलाई और खाना खिलाया। 

राज खोसला का कमाल यह था कि फिल्म के आखिरी हिस्से में अपने शॉट टेकिंग से राज जी ने ऑडियंस को बहुत क्लियर दिखाया कि कौन सा करैक्टर कहां खड़ा है। कौन किस तरफ से आ रहा है। बहुत खूबसूरती से शॉट्स क्लोज़अप और वाइट शॉट्स में मिक्स होते थे और बहुत सुंदरता से ज़ूम का इस्तेमाल किया गया। इस फिल्म में उनकी शॉट टेकिंग बहुत अलग थी। इसका एक कारण यह भी था, कि इस बार कैमरामैन प्रताप सिन्हा पहली बार राज खोसला के कैंप में आए थे। राज खोसला की तरह प्रताप सिन्हा ने भी देव साहब के बैनर ‘नवकेतन फिल्म्स’ में काम सीखा था। 

Dharmendra vs Vinod Khanna Iconic Fight Scene

मेरा गांव मेरा देश के आखिरी हिस्से में धर्मेंद्र और विनोद खन्ना के फाइट का ऑलमोस्ट सारा हिस्सा खुद धर्मेंद्र और विनोद खन्ना ने ही परफॉर्म किया था। इस सीन को शूट करते समय धर्मेन्द्र सीन में इतने खो गए, कि उन्हे याद ही नहीं रहा कि शूटिंग चल रही है। और उन्होंने जोर से बेल्ट, विनोद खन्ना की पीठ पर मार दिया। जिस कारण विनोद खन्ना की पीठ नीली पड़ गई थी। बाद में धर्मेन्द्र ने उनसे माफी मांगी। और इन दोनों की दोस्ती भी हो गई थी।

Mera Gaon Mera Desh की Box Office Success

मेरा गांव मेरा देश का बजट कितना था यह तो हम आपको नहीं बता सकते क्योंकि इसके बजट के बारे में कहीं पर भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस फिल्म का नेट कलेक्शन थी 3 करोड़ रुपए। और फिल्म सुपरहिट हुई थी। 

1971 Box Office Collection: उस साल की दूसरी सबसे बड़ी हिट क्यों बनी Mera Gaon Mera Desh

Mera Gaon Mera Desh 1971 की दूसरी सबसे बड़ी हिट फिल्म थी। पहले नंबर पर थी हाथी मेरे साथी। धर्मेंद्र इस फिल्म से पहले भी अच्छी पोजीशन पर थे। पर इस फिल्म की सफलता ने धर्मेंद्र को सही मायने में एक एक्शन स्टार बना दिया था और आने वाले कई सालों तक धर्मेंद्र टॉप स्टार बने रहे। असल में मेरा गांव मेरा देश का सबसे ज्यादा फायदा विनोद खन्ना को हुआ। विनोद खन्ना को निर्माता निर्देशक अलग नजर से देखने लगे थे। मेन स्टार कास्ट के साथ काफी सपोर्टिंग कास्ट भी थी। सुधीर दुलारी, अजीत सेन, भगवान दादा, मोहन चोटी, बीरबल और भी कई कलाकार थे।

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