मोहमद रफी ने धर्मेन्द्र के लिए गाया था आखिरी गाना। Mohd. Rafi Last Song For Dharmendra

Rafi Last Song For Dharmendra: मोहमद रफी और धर्मेन्द्र की जोड़ी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार जोड़ियों में से गिनी जाती है। रफी साहब ने धर्म जी के लिए करीब 120 से अधिक गाने गाए थे। जिनमें रोमांटिक, कॉमिक और भावनात्मक और हर तरह के गीत शामिल है। दोनों ने 1960 से लेकर 1980 तक हिंदी सिनेमा में ऐसे गीत दिए, जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा है। इत्तेफाक की बात यह है कि रफी साहब का आखिरी रिकॉर्डिंग गीत जिसे उन्होंने दुनिया से जाने से ठीक पहले रिकॉर्ड किया था। वह गाना धर्म जी पर ही फिल्माया गया था। जानिए इस गीत के बनने की पूरी कहानी।

धर्मेन्द्र जी का फिल्मी करियर

धर्मेंद्र ने अपनी फिल्मी करियर की शुरुआत 1960 में आई फिल्म “दिल भी तेरा हम भी तेरे” से की थी। इस फिल्म में उन्होंने एक सिगरेट बेचने वाले की भूमिका निभाई थी। हालांकि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उतना कोई खास कमाल नहीं कर पाई, और फ्लॉप हो गई। लेकिन धर्मेन्द्र की ऐक्टिंग इतनी लाजवाब थी, कि वो दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे।

धर्मेन्द्र जी की प्रमुख फिल्में

धर्मेन्द्र जी ने अपने पूरे करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया और रोमांटिक हीरो से लेकर एक्शन स्टार तक हर रूप में दर्शकों का दिल जीता। उन्होने शोले, चुपके-चुपके, सीता और गीता, धर्मवीर, यादों की बारात, चरस, समाधि, जुगनू, मेरा गांव मेरा देश, ड्रीम गर्ल, आजाद, अलीबाबा और 40 चोर, चुनौती, द बर्निंग ट्रेन, राम बलराम, राजपूत, बदले की आग, सम्राट, बगावत, गजब, गुलामी, जीने नहीं दूंगा, राजतिलक, तहलका और पुलिस वाला गुंडा जैसी कई हिट फिल्में दी।

धर्मेंद्र जी को उनके शानदार अभिनय के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 1997 और पद्म भूषण 2012 से सम्मानित किया गया था। धर्मेंद्र जी लगभग 89 साल की उम्र में भी काम कर रहे थे। उनकी नई फिल्म Ikkis का ट्रेलर भी रिलीज़ हुआ था जिसे खूब पसंद किया गया था। यह फिल्म जल्द ही सिनेमाघरों में आने वाली है।

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धर्मेन्द्र-रफी की जोड़ी, 120+ गाने

धर्मेंद्र की जोड़ी रफी साहब की आवाज के साथ लोग बेहद पसंद करते थे। Mohd. Rafi ने Dharmendra के लिए करीब 120 से भी अधिक गाने गाए थे। जिनमें रोमांटिक, कॉमिक और भावनात्मक और हर तरह के गीत शामिल थे। यह सभी गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं और आज भी लोग सुनना पसंद करते है। धर्मेंद्र जी की आंखों में सच्चाई और रफी साहब की आवाज में मिठास, जब यह दोनों पर्दे पर मिलते थे, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। चाहे रोमांटिक गाना हो, देशभक्ति गाना हो, रफी साहब की आवाज में जो भाव था, धर्म जी के चेहरे पर भी वही जज्बात झलकते थे। यही कारण है कि दोनों की जोड़ी ने 60 और 70 के दशक में बॉलीवुड को स्वर्णिम युग की ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

Rafi Last Song For Dharmendra
Rafi Last Song For Dharmendra

Mohd. Rafi Last Song For Dharmendra

अब बात करते हैं उस गीत की जो सिनेमा और संगीत के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। यह गीत है 1981 में रिलीज हुई फिल्म आसपास का। इस फिल्म के डायरेक्टर थे जय ओम प्रकाश और प्रोड्यूसर थे जगदीश कुमार। फिल्म में धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और प्रेम चोपड़ा मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने तैयार किया था। जबकि गीतों के बोल आनंद बक्शी ने लिखे थे। गानों के सारे वर्जनंस को मिलाकर टोटल छह गाने इसके म्यूजिक एल्बम में रखे गए थे। ये गीत थे, “मुझे दिल में बंद कर लो दरिया में फेंक दो चाभी”, “हमको भी गम ने मारा तुमको भी गम ने मारा”, “गली में मेरी एक लड़की कंवारी रहती है।” जैसे गाने फिल्म में थे। 

इन गानों में किशोर कुमार, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी थी। जिसमें से “शाम फिर क्यों उदास है दोस्त, तू कहीं आसपास है दोस्त” रफी साहब के जीवन का आखिरी गीत साबित हुआ, जो धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गया था। यही वो गीत था Rafi Last Song For Dharmendra जिसे रफी साहब ने 30 जुलाई 1980 को रिकॉर्ड किया था, और अगले ही दिन रफी साहब इस दुनिया को छोड़ कर चले गए थे।

रफी साहब दुनिया छोड़ गए

ऐसा लगता है जैसे रफी साहब को अपनी मौत का पहले ही आभास हो चुका था। क्योंकि जब रफी साहब गाने को रिकॉर्ड करके जाने लगे, तब रफी साहब ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से कहा, “Should i Leave” (क्या मैं चला जाऊं)? जिसे सुनकर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी को बड़ा अजीब लगा। क्योंकि इससे पहले रफी साहब ने उनसे कभी इस तरह की बात नहीं की थी। और अगले ही दिन रफी साहब इस दुनिया को छोड़कर चले गए थे।

“शाम फिर क्यों उदास है दोस्त, तू कहीं आसपास है दोस्त” इस गीत का हर शब्द, एक विदाई की तरह लगता है। रफी साहब की आवाज में वो गहराई, वो सुकून था, जो सीधे दिल को छू जाती थी। और यही शायद किस्मत का करिश्मा था कि एक महान गायक और एक महान अभिनेता का अमर संगम, इस आखिरी गीत के रूप में अमर हो गया।

दोस्तों आज भी जब यह गीत बजता है तो लगता है जैसे रफी साहब की आत्मा संगीत के जरिए हमसे बात कर रही हो और धर्म जी उसी भाव को पर्दे पर जी रहे हो। वास्तव में आज जब यह दोनों हमारे बीच नहीं है तो यह गीत सुनना किसी श्रद्धांजलि से कम नहीं लगता। मानो दोनों फिर से एक बार पर्दे पर साथ हो। दोस्तों अगर आप रफी साहब और धर्म जी की जोड़ी को याद कर रहे हैं तो कमेंट में लिखिए रफी साहब और धर्म जी का आपका पसंदीदा गीत कौन सा है।

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